Can I mail you in Hindi?
मेरा जन्म भले ही गुजरात के कच्छ में हुआ हो, पर मैं मुम्बई के सबर्ब घाटकोपर और डोम्बिवली में बड़ा हुआ। घाटकोपर में हम 'डूंगरी' पर रहते थे, वहाँ से अपग्रेड करके जूनी पुलिस चौकी के पीछे की एक चाल में रहे, पांचवी तक कि पढ़ाई घाटकोपर में हुई उसके बाद डोम्बिवली में नहेरु मैदान इलाकेमें एक बिल्डिंग के चौथे माले पर फ्लैटमे रहने गए। आगे की पढ़ाई वहाँ पूरी हुई।
मैं गुजराती मीडियम का अबाव एवरेज छात्र रहा हूँ। पर दसवीं या एसएससी के बाद इंग्लिश में ही आगे की पढ़ाई हुई। इंग्लिश पहले से ही मेरा फेवरिट सब्जेक्ट भी रहा है और भारत मे खास कर मुम्बई में, बिज़नेस लैंग्वेज के रूप में इंग्लिश का चलन ज्यादा रहा है। शायद इसी वजह से आज लिखने, लिखकर वार्तालाप करने और लिखकर अपने विचार प्रकट करना मैं ज्यादा प्रेफर करता हुँ। आज मुझे मेरी फर्स्ट लैंग्वेज गुजराती लिखने में ज्यादा मुश्किल होती है।
कंप्यूटर, मोबाइल और गूगल के द्वारा बनाये गए इंडिक कीबोर्ड से हिंदी या अन्य भारतीय भाषा, जो मैं समझ सकता हु, उसे टाइप करते समय भी मैं इंग्लिश में वर्ड टाइप करना प्रेफर करता हुँ। शुध्द वर्णमालावाले कीबोर्ड पे टाइप करते समय मैं शब्द को ढूंढते रह जाता हूं।
हालांकि जितनी आसानी से मैं इंग्लिश लिख पढ़ लेता हूँ, बोलते समय मैं उतना ही परेशान होता हूँ। कभी कभी तो लगता है कपिल शर्मा भी मुझसे अच्छी इंग्लिश बोल लेता है।
बोलतेे समय, जितनी आसानी से मैं अपने विचार गुजराती या हिन्दी में व्यक्त कर पाता हूँ, उतनी आसानी से मैं इंग्लिश में अपने विचारों को व्यक्त नही कर पाता। और मैंने देखा है, मेरे आसपास के लोग, दोस्त, परिवार के सदस्य, समाज के लोग, इन सभी के सामने अगर कोई फर्राटेदार इंग्लिश बोलता है तब उसके आगे सब मिमिया जाते है। हालांकि मेरी बेटियाँ, जो कि इंग्लिश मीडियम में शिक्षा प्राप्त कर रही है, उन्हें शायद आसानी होती होगी। और शायद आजकल के सभी बच्चे जिनकी मातृभाषा में पढ़ने की परंपरा टूट गई है और जो आज के ट्रेंड के अनुसार इंग्लिश मध्यम से ही पढ़ रहे है, उन्हें भी आसानी होती हो।
आज हम एक सैंडविच जनरेशन है। हमारे मातापिता जिन्होंने स्कूल ही न देखी हो और शायद पाँचवी-छठी कक्षा से आगे नही बढ़ पाए, जिनकी शिक्षा गाँव के ही आंगनवाड़ी स्कूल में हुई हो! और हमारी संतान जो कि इंग्लिश मीडियम की शिक्षा प्राप्त कर और अपनी मातृभाषा का ऑप्शन न होंने पर, हमारे घर के टेबल पर पड़े मातृभाषा के अखबार के शीर्षक पढ़ने और एड्स देखने से ही संतुष्ट होते है। और 'दी लकिएस्ट अमंगस्ट आल' ऐसे हम जो की दोनों पीढियो के मध्यस्थि हो।
जैसा मैंने पहले भी कहा कि, हम बिज़नेस लैंग्वेज के रूप में इंग्लिश को ऐसे अपना चुके है, जैसे हम भी अपने बच्चों की तरह कॉन्वेंटिया एजुकेशन ले चुके हो। इस कॉम्पिटीशन युग में जहाँ मेरे जैसे सामान्य आईक्यू का व्यक्ति, जिनकी पढ़ाई मुम्बई जैसे शहर में हुई हो, वह इंग्लिश तो अच्छी तरह लिख लेता होगा, पर हमारी वोकेबुलरी इतनी स्ट्रांग नही हुई है। आज हमारे शब्दकोश में गिने चुने वर्ड्स है जो रिपीट होते रहते है, जिससे हमारा रोजमर्रा का बिजनेस चल सकता है। पर जो व्यक्ति अपने गाँव के आसपास के छोटेसे शहर में पढ़कर आया हो, जहा इंग्लिश सिखाने, लिखने और बोलने को इतना महत्व नही दिया जाता, वहाँ से आये व्यक्ति की इंग्लिश लिखने की स्किल्स रोजमर्रा के बिजनेस चलाने के लिए शायद उपयुक्त न हो।
आज भी मेरे साइट पे क्लाइंट के इंजीनियर जब मेल लिख रहे होते है, तब मैं सोचने लगता हूँ कि इसको इंजीनियर की डिग्री कैसे मिल गई?! कभी कभी तो व्याकरण भी ऐसा के अर्थ का अनर्थ हो जाये। उनके मेल को अगर कोई पहेली दफा पढ़ रहा हो तो ऐसे ही लगता है कि शायद वो कोई पॉलिटिक्स कर रहा है या अपना पल्ला झाड़ रहा है। जैसे के आजकल के कॉर्पोरेट का ट्रेंड है 'नेवर कीप बॉल इन योर कोर्ट' जैसे ही कोई मेल आया तुरंत रिप्लाई तो करना बनता ही है जिससे हम सेफ रहे। पर अगर उनके व्याकरण को पकड़े तो शायद ये एक जबरदस्त फेलियर है।
जब से कंप्यूटर युग शुरू हुआ, हमारे पास इंग्लिश में लिखने के सिवाय कोई विकल्प नही था। पर आज आई-टी क्षेत्र इंटरनेट, ईमेल और अन्य माध्यमो में जो डेवलपमेंट हुई है, अब ये संभव है कि हम अपनी बिज़नेस लैंग्वेज को बदल सकते है। जब मै लोगो को इंग्लिश में कम्युनिकेट करते हुए गलत शब्दो का चुनाव करते या गलत व्याकरण का प्रयोग करते हुए देखता हूँ मैं सोचता हूं कि हम अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी मे कन्वर्सेशन क्यों न करें।
कॉम्युनिकेशन के लिए हम जो भी मीडियम यूज़ करें, जहा इंटरनेशनल बिज़नेस की बात हो वहाँ हम कॉमनली अंडेरस्टेबल लैंग्वेज में कम्युनिकेट करें वो ठीक है। पर जब तक भाषा की लिमिटेशन न हो तब हमें एकदूसरे को कम्फ़र्टेबल हो उसी भाषा मे व्यवहार करें और बात का जो मूल है, या जो क्रक्स है, उसे हम सही तरह पहुँचा सके तो कैसा होगा?
आपके विचार मुझे जरूर बताएं।
मैं गुजराती मीडियम का अबाव एवरेज छात्र रहा हूँ। पर दसवीं या एसएससी के बाद इंग्लिश में ही आगे की पढ़ाई हुई। इंग्लिश पहले से ही मेरा फेवरिट सब्जेक्ट भी रहा है और भारत मे खास कर मुम्बई में, बिज़नेस लैंग्वेज के रूप में इंग्लिश का चलन ज्यादा रहा है। शायद इसी वजह से आज लिखने, लिखकर वार्तालाप करने और लिखकर अपने विचार प्रकट करना मैं ज्यादा प्रेफर करता हुँ। आज मुझे मेरी फर्स्ट लैंग्वेज गुजराती लिखने में ज्यादा मुश्किल होती है।
कंप्यूटर, मोबाइल और गूगल के द्वारा बनाये गए इंडिक कीबोर्ड से हिंदी या अन्य भारतीय भाषा, जो मैं समझ सकता हु, उसे टाइप करते समय भी मैं इंग्लिश में वर्ड टाइप करना प्रेफर करता हुँ। शुध्द वर्णमालावाले कीबोर्ड पे टाइप करते समय मैं शब्द को ढूंढते रह जाता हूं।
हालांकि जितनी आसानी से मैं इंग्लिश लिख पढ़ लेता हूँ, बोलते समय मैं उतना ही परेशान होता हूँ। कभी कभी तो लगता है कपिल शर्मा भी मुझसे अच्छी इंग्लिश बोल लेता है।
बोलतेे समय, जितनी आसानी से मैं अपने विचार गुजराती या हिन्दी में व्यक्त कर पाता हूँ, उतनी आसानी से मैं इंग्लिश में अपने विचारों को व्यक्त नही कर पाता। और मैंने देखा है, मेरे आसपास के लोग, दोस्त, परिवार के सदस्य, समाज के लोग, इन सभी के सामने अगर कोई फर्राटेदार इंग्लिश बोलता है तब उसके आगे सब मिमिया जाते है। हालांकि मेरी बेटियाँ, जो कि इंग्लिश मीडियम में शिक्षा प्राप्त कर रही है, उन्हें शायद आसानी होती होगी। और शायद आजकल के सभी बच्चे जिनकी मातृभाषा में पढ़ने की परंपरा टूट गई है और जो आज के ट्रेंड के अनुसार इंग्लिश मध्यम से ही पढ़ रहे है, उन्हें भी आसानी होती हो।
आज हम एक सैंडविच जनरेशन है। हमारे मातापिता जिन्होंने स्कूल ही न देखी हो और शायद पाँचवी-छठी कक्षा से आगे नही बढ़ पाए, जिनकी शिक्षा गाँव के ही आंगनवाड़ी स्कूल में हुई हो! और हमारी संतान जो कि इंग्लिश मीडियम की शिक्षा प्राप्त कर और अपनी मातृभाषा का ऑप्शन न होंने पर, हमारे घर के टेबल पर पड़े मातृभाषा के अखबार के शीर्षक पढ़ने और एड्स देखने से ही संतुष्ट होते है। और 'दी लकिएस्ट अमंगस्ट आल' ऐसे हम जो की दोनों पीढियो के मध्यस्थि हो।
जैसा मैंने पहले भी कहा कि, हम बिज़नेस लैंग्वेज के रूप में इंग्लिश को ऐसे अपना चुके है, जैसे हम भी अपने बच्चों की तरह कॉन्वेंटिया एजुकेशन ले चुके हो। इस कॉम्पिटीशन युग में जहाँ मेरे जैसे सामान्य आईक्यू का व्यक्ति, जिनकी पढ़ाई मुम्बई जैसे शहर में हुई हो, वह इंग्लिश तो अच्छी तरह लिख लेता होगा, पर हमारी वोकेबुलरी इतनी स्ट्रांग नही हुई है। आज हमारे शब्दकोश में गिने चुने वर्ड्स है जो रिपीट होते रहते है, जिससे हमारा रोजमर्रा का बिजनेस चल सकता है। पर जो व्यक्ति अपने गाँव के आसपास के छोटेसे शहर में पढ़कर आया हो, जहा इंग्लिश सिखाने, लिखने और बोलने को इतना महत्व नही दिया जाता, वहाँ से आये व्यक्ति की इंग्लिश लिखने की स्किल्स रोजमर्रा के बिजनेस चलाने के लिए शायद उपयुक्त न हो।
आज भी मेरे साइट पे क्लाइंट के इंजीनियर जब मेल लिख रहे होते है, तब मैं सोचने लगता हूँ कि इसको इंजीनियर की डिग्री कैसे मिल गई?! कभी कभी तो व्याकरण भी ऐसा के अर्थ का अनर्थ हो जाये। उनके मेल को अगर कोई पहेली दफा पढ़ रहा हो तो ऐसे ही लगता है कि शायद वो कोई पॉलिटिक्स कर रहा है या अपना पल्ला झाड़ रहा है। जैसे के आजकल के कॉर्पोरेट का ट्रेंड है 'नेवर कीप बॉल इन योर कोर्ट' जैसे ही कोई मेल आया तुरंत रिप्लाई तो करना बनता ही है जिससे हम सेफ रहे। पर अगर उनके व्याकरण को पकड़े तो शायद ये एक जबरदस्त फेलियर है।
जब से कंप्यूटर युग शुरू हुआ, हमारे पास इंग्लिश में लिखने के सिवाय कोई विकल्प नही था। पर आज आई-टी क्षेत्र इंटरनेट, ईमेल और अन्य माध्यमो में जो डेवलपमेंट हुई है, अब ये संभव है कि हम अपनी बिज़नेस लैंग्वेज को बदल सकते है। जब मै लोगो को इंग्लिश में कम्युनिकेट करते हुए गलत शब्दो का चुनाव करते या गलत व्याकरण का प्रयोग करते हुए देखता हूँ मैं सोचता हूं कि हम अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी मे कन्वर्सेशन क्यों न करें।
कॉम्युनिकेशन के लिए हम जो भी मीडियम यूज़ करें, जहा इंटरनेशनल बिज़नेस की बात हो वहाँ हम कॉमनली अंडेरस्टेबल लैंग्वेज में कम्युनिकेट करें वो ठीक है। पर जब तक भाषा की लिमिटेशन न हो तब हमें एकदूसरे को कम्फ़र्टेबल हो उसी भाषा मे व्यवहार करें और बात का जो मूल है, या जो क्रक्स है, उसे हम सही तरह पहुँचा सके तो कैसा होगा?
आपके विचार मुझे जरूर बताएं।
आपका स्वागत है
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